सोमवार, 9 अगस्त 2010

दे नाम भी राज द्रोही
कोई परवाह नहीं
मेरी कविता पर
न मिले वाह-वाह
कोई परवाह नहीं
सरहद के पार है जो
इस पार भी वही हालत है
यहाँ हिन्दू मुस्लिम
वहा सिया सुन्नी
यहाँ कहे घुस पेठिये
वहा काफ़िर है
ये फकत सियासती तकरीर है
जिस दिन तुम मनाओ
उसी दिन हमारा भी
आज़ादी का जश्न है
पर कायम एक प्रश्न है
कौम मजहब और जुबान
का फसाद
इधर भी वही विवाद
खीच रहा जो नफ़रत की लकीर है
हमारे हुक्मरान उसी के वजीर है
झूट नहीं हकीक़त को लिखा है
साजिशो का निजाम अमेरिका है
गोला बारूद मिसाईले उसकी तिजारत
हमारे अमन से उसकी अदावत
पर सरहदों को अब दिलो से paat दो
उसकी मिसाइलो को उसी की और मोड़ दो

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