सागर से उठता धुआं
शनिवार, 7 अगस्त 2010
जख्म देना हो जिनकी फितरत
उनसे बेकार है मरहम की हसरत
जिन आँखों में ख्वाब हो देखना मय्यत
वहां जिंदगी का पनपना होगा अचरज
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें