मंगलवार, 29 जून 2010

अपने ,अपने बनने से पहले बदल गए

अश्क बन के आँखों से निकल गए

प्रीत की प्यास जगी थी जिन्हें निर्मल झील समझ के

वो खारे सागर में बदल गए

उनकी स्म्रतियां लिपटी थी मन से

अमरबेल की तरह

और हम सूखे दरख्त में बदल गए

पूजा के लीए जाया करते थे

जिन मंदिरों में

अब वो भी खंडरो में बदल गए !

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