बुधवार, 16 जून 2010

क्या है कविता नहीं जनता

क्या है कविता जानता नहीं मै \
टूटे फूटे शब्दों को
कविता बनता हूँ मै !
आंसू है स्याही नहीं
खरीद सकता मै
आपने ही जज्बातों को कविता
बनाता हूँ मै
समझो न दलाल मुझे खुद बिकना
खुद बिकना चाहता हूँ


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