गुरुवार, 1 जुलाई 2010

जब बैठा कविता लिखने को
न होटो पर वो हंसी थी
जब यद् उसकी आई तो रूह भी
मेरी रोई थी
किस कदर करू उसकी तारीफ़
भगवान ने भी उसे पाई थी
भूल न पाता हूँ उसकी यादो को
जब वो रात को अपने आँचल में
छुपा लिया कराती थी
मै जब रूठ जाता तो मुझे मनाया करती थी
मेरे सारे गम लेकर आपनी खुशिया दिया करती थी
आज न वो मेरे पास है
छोड़ कर चली गई
क्यू कहू उसे बेवफा
क्यू की वो मेरी माँ थी
जो स्वर्ग वास चली गई

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